“सारा जीवन ही योग है” – श्री अरविन्द
जीवन
जीवन एक तीर्थ यात्रा है, एक दिव्य यज्ञ है – इस सत्य को हम वैदिक काल से आज तक सुनते चले आ रहे हैं। यह यात्रा आज तक अनवरत चली आ रही है, किंतु इसका अंत दिखाई नहीं देता।
एक ही कारण है सृष्टि विकास के पीछे मानव जीवन में एक प्यास है, जो शांत होना नहीं जानती। उसे पूर्णता चाहिये, प्रकाश चाहिये, शांति चाहिये, कुल मिलाकर उसे आनंद और अमरता चाहिये।
किंतु हम इस जीवन यात्रा के मध्यकाल से गुजर रहे हैं। जहां हम दिव्य और आसुरी दोनों शक्तियों से घिरे हुए हैं। आसुरी शक्तियों ने हमें भय, निराशा, तनाव, रोग, ईर्ष्या, भोगों, कामनाओं, वासनाओं तथा इच्छाओं के जाल में बांध लिया है। दूसरी और दिव्य शक्तियाँ हमें जीवन में शांति, विश्वास, धैर्य, समता, शक्ति, भक्ति, ज्ञान, प्रेम, सौन्दर्य, आनंद, भागवत कृपा और आशीर्वाद के अनुभव प्रदान कर रही है। हमें चुनाव करना है। आज और इसी क्षण। ये भागवत मुहूर्त की दिव्य घड़ियाँ है। दिव्य शक्तियों को समर्पित होकर आध्यात्म के शिखर पर चढ़ना है या आसुरी शक्तियों की पकड़ में आकर जीवन को अचित में धकेल देना है।
नहीं कदापि नहीं, भगवान ने यह सुंदर दुनिया बनाई है। हम मानव उसकी सबसे विकसित और सुंदर कृति है। वह हमारे अंदर है। उसे हमसे कई अपेक्षाएँ है। पहली अपेक्षा है हम उस जैसे बन जाएँ। इसके लिए आवश्यक है प्रयास और प्रगति। प्रयास और प्रगति ही हमें उस जैसा बना सकती है। हम स्वयं अपने आंतरिक रूपांतर के लिये प्रयास करें। प्रगति सुनिश्चित है।
आइये, हम सब अपनी आंतरिक सत्ता में एक होकर जीवन रूपी यज्ञ को प्रारंभ करें । एक साहसिक प्रयास की ओर कदम बढ़ाएँ। आंतरिक प्रगति के द्वार खोलें।
जीवन के द्वंदों के भीषण कुरुक्षेत्र में भगवान के समक्ष विजय की प्रार्थना और अभीप्सा करें। संसार में रहते हुये बुरी प्रवृतियों का त्याग करते हुए सहज जीवन जीना महाविजय और सौभाग्य है। केवल संसार में जीना पराजय और दुर्भाग्य है। आओ, हम सब जीवन को महाविजयी बनायें।
